शिक्षा और भूख

“देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर”, बिहारी जी की ये एक पंक्ति आज से एक साल पहले से मेरे जेहन में घर सी कर गयी है| यह कहानी कही न कही इन्ही पंक्तियों को सत्य करती दिखाई देती है|हाथ में सब्जी की टोकरी लिए हुए, बाज़ार में खड़ी एक बच्ची का सब्जी बेचना भले ही छोटी बात लगे पर हकीक़त में यह बहुत बड़ी विडम्बना है| राजस्थान के उस छोटे और खुबसूरत शहर ‘डूंगरपुर’ में उस बच्ची ने न केवल मुझे परिस्थितियों से अवगत कराया था बल्कि मेरे खुद के होने का एवं मेरे दायित्वों का भी एहसास दिया था, मुझे! यह कहानी विशेषत: ‘शिक्षा एवं भूख’ के संबंधो के बारे में है| आज के दौर में जब हम “पढ़ेगा इंडिया तब ही बढेगा इंडिया” जैसे नारो पर जोर देते है तो ‘शिक्षा और भूख’ एक गंभीर विषय बनकर सामने आती है किसी भी बच्चे के वर्त्तमान और भविष्य के परिस्थितियों के आकलन के लिए|

यह कहानी वर्ष 2015 की है जब मै कॉलेज की ओर से राजस्थान में ‘मजदूर किसान शक्ति संघटन’ (MKSS) के द्वारा चलाये जा रहे एक “100 दिवसीय जवाबदेही यात्रा” में था| उसी यात्रा के एक पड़ाव में मुझे एक छोटी बच्ची स्कूलड्रेस में बाज़ार में खड़ी दिखी|उसके हाथ में एक छोटी सी टोकरी थी और उसमे थी कुछ सब्जियां|वो आवाज़ लगा रही थी सब्जी ले लो, सब्जी ले लो|मुझे न चाहते हुए भी उसके पास रुकना पड़ा| |मैंने उससे उसका नाम पूछा|बहुत ही शालीनता के साथ उसने जवाब दिया पूजा|

फिर मैंने पूछा किस कक्षा में पड़ती हो और तुम्हारा गावं कहा है? जवाब आया “तीसरी कक्षा में और मेरा गावं न.. दूर है यहाँ से|अब फिर सवाल, कितना दूर है? वो बहुत दूर है, पैदल चलना पड़ता है फिर टेम्पो से यहाँ आती हूँ|” अच्छा…. उसके बातों ने अचंभित कर दिया मुझे|

अब मुझे अपनी हालत पर शर्म आ रही थी| उसका सवाल जायज था| पेट की जगह सवालें किस को रास आती है? वहां मेरे और उसके साथ अजीब सवाले थी| या तो मै उसके हालत पर मज़े ले रहा था या उसकी भावनाओ को कुरेद रहा था|मानना पड़ेगा उसके सब्र को|मै ज्यादा सवाल न कर संकू इसीलिए उसने मुझसे कहा भैया कुछ लेना है आपको की ऐसे ही बाते कर रहे हो? इतनी छोटी उम्र,सुबह हाथ में किताबें तो शाम में सब्जी की टोकरी| कभी अपने पिता की उंगलिया पकड़ उस बाज़ार में अनजाने से नज़रो के साथ ये जानने की कोशिश करती थी की ये क्या है? आज एक गाइड की तरह उस बाज़ार के चप्पे-चप्पे से वाकिफ थी|

अब सवाल ये था की क्या ये समाज की देन थी?या सरकार की नाकामियां? शिक्षा का अधिकार का ही ये दूसरा रूप है जिसका सवाल लिए वो छोटी बच्ची ३ घंटे बाज़ार में खड़ी रहती है|किताब की चाहत की जगह शायद पैसो की जरूरत उसे ज्यादा थी|आह्ह! उसका और हमारे समाज का ये दर्द, गरीबी की ज़ंजीरो में जकड़ी जिंदगी, आँखों में से सुखते हुए आंशु

जब मै इस कहानी के लिखने के एक साल बाद नौकरी करने के लिए राजस्थान गया| मेरी नौकरी प्राथमिक विधालयों के बच्चों और शिक्षकों से ही सम्बंधित थी| इसलिए शिक्षा से जुड़े खबरों से रूबरू होना होता था| उसी दौरान मुझे चला की राजस्थान सरकार कम उपस्थिति और छात्र संख्या वाले प्राथमिक स्कूलों का उच्च प्राथमिक अथवा उच्चतर प्राथमिक स्कूलों में विलय रही है| जिसके पीछे ये कारण दिया गया सरकार के द्वारा की इससे उपलब्ध स्रोतों का अच्छे से इस्तेमाल हो सकेगा और गुणवत्ता में सुधर हो सकेगी| जहाँ तक कम उपस्थिति और छात्र संख्या वाले स्कूलों का सवाल है मुझे जापान की हाल ही में प्रकाशित हुयी एक घटना याद आई| जहाँ पे एक लड़की के लिए एक पूरी ट्रेन को साल भर से ज्यादा तक चलाया गया, जिससे कि उसकी पढाई ख़राब ना हो सके और वो अपनी डिग्री पूरी कर सके| जहाँ पहले से ही पूजा और उसकी जैसी अन्य लड़किया स्कूल तक पहुँच सकने के लिए पुरे “समाज, परंपरा, और पितृसत्ता” जैसे मजबूत संस्थाओं से लड़ रही है| जिनका ये कहना रहता है की लड़कियों को घर में रहना चाहिए, स्कूल दूर है, वहां उनकी सुरक्षा कौन करेगा? इत्यादि, हो सकता है कि अब सरकार के द्वारा स्कूलों को दूर करने से उनका ये हौंसला भी टूट जाए| मुझे पता नहीं पर ऐसा जरूर लगता है की पहले जो स्कूल गावं में थे विलय के बाद दूर हो गए होंगे| पूजा और अन्य लड़कियों को शिक्षा के लिए, जोकि हाल ही में ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009’ के तहत हर बच्चे का मुलभुत अधिकार है, और मेहनत करना होगा| पहले ही भूख की समस्या क्या कम थी उस बच्ची के लिए?

हालाँकि  मेरी यह कहानी भूख और शिक्षा के सम्बन्ध को लेकर है तो इसी का एक दूसरा पहलू भी उन्ही दिनों मेरे सामने आया जोकि ये था -मैंने एक अखबार में ये पढा की अंग्रेजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों के टिफ़िन की जाँच की जाये कि क्या उसमे जंक फ़ूड है, जिससे की उनकी सेहत का ख्याल रखा जा सके|मेरी इस कहानी में जहाँ पूजा हरी सब्जियां बेच रही है और उसे खुद नहीं पता की कल के दोपहर स्कूल में उसे चावल मिलेगा या उसमे पड़ा कीड़ा| जहाँ सरकार, सरकारी प्राथमिक विद्यालय, अरे नहीं सरकारी गरीब विद्यालय में अच्छे से मिड-डे-मिल योजना की जाँच नहीं कर पा रही है, वहीँ वो अंग्रेजी स्कूलों के बच्चे , जिनको उनके माँ-पिता से टिफ़िन मिलती है, के गुणवत्ता की जाँच करवा रहे है|

अगर मेरी जगह पूजा इस खबर को पढ़ रही होती तो शायद यही सोचती आखिर सरकार क्यों ये चाउमीन, समोसा, रोल, पास्ता, इत्यादि बंद करवा रही है? हमें दे देते तो कितना अच्छा होता? पूजा जैसे बच्चों के लिए ये जंक फ़ूड और फ़ास्ट फ़ूड, ड्रीम फ़ूड के जैसे होते है| जब हम ‘भूखे पेट भजन न होय गोपाला’ जैसे कहावतो को सुनते है और अपने माँ-पिता के द्वारा खाने पर जोर देने को देखते है, तो आखिर हम कैसे ही शिक्षा और भूख जैसी मुलभुत सुविधाओं को एक दुसरे से अलग करके देख सकते है?

जहाँ एक तरफ हम लड़कियों के आगे बढ़ने की बात कर रहे है, उनके उच्च शिक्षा की बात कर रहे है, वहां सरकार का ये कदम पूजा जैसी लड़कियों के लिए हतोत्साहन है| आखिर हम बात करे भी तो कैसे करे ‘उच्चतर शिक्षा’ की जबकि प्राथमिक शिक्षा का ये हाल है| [1] है| जोकि भारत जैसे बड़े आबादी वाले देश में कम नहीं है|क्या जिस पथ पर, जिस यात्रा में मै था, इन सब सवालों का जवाब दे सकता था? शायद हाँ |या शायद नहीं| उसके दर्द से ज्यादा मुझे अपने जैसों एवं सरकार की नाकामी पर कसक है|

ये कहानी पहले भी (22nd January, 2017) पर प्रकाशित की गयी है और यहाँ पर कुछ बदलाव के साथ है|

[1]http://www.business-standard.com/article/current-affairs/primary-level-dropout-rate-in-india-was-4-13-in-2014-15-prakash-javadekar-118010400732_1.html

Akash Kumar
Research Assistant, CBPS

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *